नरसी मेहता

संत कवि गुजराती भक्ति भाषा संगम

जीवन परिचय

नरसी मेहता (जिन्हें नरसिंह मेहता के नाम से भी जाना जाता है) का जन्म 1414 में गुजरात के जूनागढ़ के समीप तलाजा गाँव में हुआ था। वे गुजराती भक्ति साहित्य के सर्वश्रेष्ठ संत कवि माने जाते हैं। वे बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहते थे। वे छुआछूत का विरोध करते थे और हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन करते थे। इसके कारण उनकी बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, परंतु वे अपने मार्ग से न डिगे। उनका निधन 1478 (या 1481) में हुआ।

प्रमुख रचनाएँ

  • भजन: वैष्णव जन तो तेने कहिए (विश्व-प्रसिद्ध भजन)
  • पद: कृष्ण-भक्ति से संबंधित अनेक पद और भजन
  • आख्यान: नरसी नो गुणो (आत्मकथात्मक काव्य)

लेखन शैली

नरसी मेहता की भाषा गुजराती है जो सहज, लोकजीवन से जुड़ी और भाव-पूरित है। उनके भजनों में कृष्ण-भक्ति, सामाजिक समानता, वैराग्य और मानवीय मूल्यों का सुंदर संगम है। उनकी भक्ति में आडंबर नहीं, सहजता है। 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' में उन्होंने एक सच्चे वैष्णव के लक्षण बताए हैं।

साहित्यिक योगदान

नरसी मेहता को गुजराती भक्ति साहित्य में वही स्थान प्राप्त है जो हिंदी में सूरदास को। उनका 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' भजन महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं का अविभाज्य अंग था। गांधी जी इस भजन से इतने प्रभावित थे कि 'हरिजन' शब्द का चयन भी नरसी के प्रभाव से किया। यह भजन भारत की सांस्कृतिक एकता और बहुभाषीय विरासत का प्रतीक बन गया।

गंगा पाठ्यपुस्तक में

गंगा पाठ्यपुस्तक के 'भाषा संगम' खंड में नरसी मेहता का विश्व-प्रसिद्ध भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' शामिल है। यह खंड भारत की बहुभाषीय विरासत को प्रस्तुत करता है।

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