जगदीशचंद्र माथुर
नाटककार एकांकीकार गद्य 6
जीवन परिचय
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म 2 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ था। वे आधुनिक हिंदी नाटक के अग्रणी नाटककारों में से हैं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और भारतीय ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (आकाशवाणी) में कार्य किया। उन्होंने हिंदी नाटक और एकांकी को नए विषयों और शैलियों से अभिन्न किया। उनका निधन 18 अक्टूबर 2003 को हुआ।
प्रमुख रचनाएँ
- नाटक: कोण-पूर्ण, दादू का दर्द, हिमानी, भोलाराम का जीव
- एकांकी: रीढ़ की हड्डी, बालक, शोक-नाभि आले आँसू, निदान
लेखन शैली
माथुर जी के नाटक सामाजिक विसंगतियों, रूढ़ियों और मध्यवर्गीय जीवन के संघर्षों से जुड़े हैं। उनकी शैली यथार्थवादी, संवाद-प्रधान और विचारोत्तेजक है। उन्होंने स्त्री शिक्षा, विवाह प्रथा और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषयों पर डटकर लिखा। उनकी भाषा सहज और प्राकृतिक है।
साहित्यिक योगदान
जगदीशचंद्र माथुर ने हिंदी एकांकी को एक गंभीर और सामाजिक-चेतना से युक्त विधा के रूप में स्थापित किया। उनका नाटक 'रीढ़ की हड्डी' हिंदी नाट्य-साहित्य की एक महत्वपूर्ण रचना है जो स्त्री सशक्तीकरण और पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देती है।
गंगा पाठ्यपुस्तक में
गंगा पाठ्यपुस्तक के गद्य खंड में माथुर जी का प्रसिद्ध एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' शामिल है।
विस्तृत अध्ययन सामग्री
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