संवादहीन
लेखक: शेखर जोशी कहानी गद्य 3
पाठ का सारांश
शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' आधुनिक युग की भावनात्मक विच्छिन्नता और संवादहीनता को उकेरती है। कहानी के केंद्र में एक ऐसा परिवार है जहाँ तकनीकी विकास और आधुनिकता के बीवी बढ़ते अंतराल के कारण पारिवारिक संवाद और संवेदना सिकुड़ती जा रही है। लेखक समाज में गहराते व्यक्तिगत एकाकीपन, मानवीय संबंधों के क्षरण और आपसी समझ के अभाव को संवेदनशील शैली में प्रस्तुत करते हैं। कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या विकास की कीमत पर हम अपनी मानवीयता खो रहे हैं।
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